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शुक्रवार, 3 जनवरी 2020

सावित्रीबाई फुले का जन्म दिवस शिक्षा दिवस के रूप में मनाया गया#Public Statement


(विष्णु चंंसौलिया की रिपोर्ट) 03-01-2020 उरई(जालौन)। उरई ऑल आरक्षित टीचर वेलफेयर एसोसिएशन एवं सहयोगी संगठन के तत्वाधान में भारत में वंचित समुदाय महिलाएं शिक्षा की ज्योति जलाने वाली प्रथम शिक्षिका राष्ट्रमाता सावित्रीबाई फुले जी की जयंती पर शैक्षिक उन्नयन संगोष्ठी एवं शिक्षक दिवस सम्मान समारोह आयोजित किया गया ।

कार्यक्रम में मुख्य अतिथि मुख्य विकास अधिकारी प्रशांत कुमार रहे विशेष अतिथि जिला विद्यालय निरीक्षक व प्रभारी बेसिक शिक्षा अधिकारी भागवत पटेल नीरज पटेल सुंदर सिंह शास्त्री राधेश्याम अंजू चौधरी रेहाना मंसूरी आदि रहे। कार्यक्रम की अध्यक्षता जिला अध्यक्ष मिस्टर सिंह व संचालन अनुरोध निरंजन के.के शिरोमणि आदि ने संयुक्त रूप से किया इस अवसर पर विशेष शास्त्री भगवत पटेल जी ने महिला शिक्षा के प्रति सावित्री फुले का जो योगदान था वह आज प्रसांगिक है।

 बुंदेलखंड जैसे क्षेत्र में अभिभावक अपनी बच्चियों को शिक्षित करने पर जोर देते हैं तो निश्चित तौर पर महिला शिक्षा का स्तर सुधरेगा सुंदर शास्त्री नीरज पटेल डॉक्टर कमलेश कुशवाहा ने भी अपने-अपने विचार रखे मुक़द्दर विकास अधिकारी श्री के श्रीवास्तव ने कहा शिक्षा ही सारी समस्याओं से छुटकारा दिलाती है आधुनिक युग में जो जितना ज्ञान है वही समाज में सम्मान पाता है और समाज को कुरीतियों जैसे दूर कर पाते हैं। उन्नीसवीं सदी के दौर में भारतीय महिलाओं की स्थिति बड़ी ही दयनीय थीं। जहां एक ओर महिलाएं पुरुषवादी वर्चस्व की मार झेल रही थीं, तो दूसरी ओर समाज की रूढ़िवादी सोच के कारण तरह-तरह की यातनाएं व अत्याचार सहने को विवश थीं।


हालात इतने बदतर थे कि घर की देहरी लांघकर महिलाओं के लिए सिर से घूंघट उठाकर बात करना भी आसान नहीं था। लंबे समय तक दोहरी मार से घायल हो चुकीं महिलाओं का आत्मगौरव और स्वाभिमान पूरी तरह से ध्वस्त हो चुका था।
समाज के द्वारा उनके साथ किये जा रहे गलत बर्ताव को वे अपनी किस्मत मान चुकी थीं। इन विषम हालातों में दलित महिलाएं तो अस्पृश्यता के कारण नरक का जीवन भुगत रही थीं। ऐसे विकट समय में सावित्रीबाई फुले ने समाज सुधारक बनकरमहिलाओं को सामाजिक शोषण से मुक्त करने व उनके समान शिक्षा व अवसरों के लिए पुरजोर प्रयास किया।

गौरतलब है कि देश की पहली महिला शिक्षक, समाज सेविका, मराठी की पहली कवियित्री और वंचितों की आवाज बुलंद करने वाली क्रांतिज्योति सावित्रीबाई का जन्म 3 जनवरी, 1831 को महाराष्ट्र के पुणे-सतारा मार्ग पर स्थित नैगांव में एक दलित कृषक परिवार में हुआ था। उनके पिता का नाम खण्डोजी नेवसे और माता का नाम लक्ष्मीबाई था।
1840 में मात्र 9 साल की उम्र में सावित्रीबाई का विवाह 13 साल के ज्योतिराव फुले के साथ हुआ। विवाह के बाद अपने नसीब में संतान का सुख नहीं होते देख उन्होंने आत्महत्या करने जाती हुई

एक विधवा ब्राह्मण महिला काशीबाई की अपने घर में डिलीवरी करवा उसके बच्चे को दत्तक पुत्र के रूप में गोद ले लिया और उसका नाम यशंवत राव रख दिया। बाद में उन्होंने यशवंत राव को पाल-पोसकर व पढ़ा-लिखाकर डॉक्टर बनाया। इस मौके पर अमृतलाल प्रेम कुमार कुशवाहा सुनील दत्त भूरी देवी दीनदयाल श्रीवास रितेश कुमार भगवान सिंह यादव महेंद्र पाल बहोरन सिंह छत्रपाल सिंह दीपेंद्र सिंह आदि मौजूद रहे।

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