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शुक्रवार, 9 फ़रवरी 2018

#कानपुरः भावुक हुई महापौर बोली माँ हूँ तेरी असली न सही मगर असली ही समझना।


कानपुर:- कानपुर की दो बेटियां अपनी सरजमीं को चूमने आई हैं। इन्हें तलाश है अपने उन मां-बाप की जो इनसे बचपन में ही बिछड़ गए। भले ही अब ये अमेरिकी हो गई हों मगर जानना चाहती हैं कि इनके माता-पिता कौन हैं। उनके चरणों को स्पर्श करके गले लग जाने को बेताब हैं। कहती हैं-हमें नहीं पता कि वे कौन थे जिनकी गोद में हम पहली बार खिलखिलाए। आज तो हम यह जानना चाहते हैं कि किस घर में हम पैदा हुए थे? मां-बाप का क्या नाम था? हमारा बचपन उनकी आंखों के सामने कैसे बीता? सच मानिए, ये जिससे भी ये सवाल पूछती हैं, उसकी आंखें नम हो जाती हैं।

इन बेटियों के नाम हैं रबैका निर्मला पिनॉक और स्टेफनी कृपा कूपर ल्युटिर। अब ये जानना चाहती हैं कि निर्मला और कृपा नाम कैसे रखे गए। ये किस तरह निर्मला से रबैका पिनॉक और स्टेफनी ल्यूटिर बन गईं। इनकी जिंदगी की पटकथा भी उस तमन्ना से कुछ मिलती जुलती है जिसमें पूजा भट्ट को किन्नर टिक्कू अली सैय्यद (परेश रावल) ने पिता की तरह पाला मगर हकीकत में पिता नहीं था। तमन्ना को जब हकीकत का पता चली तो उसने असली मां-बाप की तलाश शुरू की। उस पटकथा में एक तमन्ना थी जबकि यहां दो हैं। ये ईश्वर से यही मना रही हैं कि उनके माता-पिता जिंदा हों। दोनों चाहती हैं कि पूर्वजों में से कोई मिल जाए जो यह बता सके कि उनका बचपन किन गलियों में बीता था। गुरुवार को ये दोनों कैंटोनमेंट में शिशु सदन भी गई थीं मगर वहां भी इनके मां-बाप का कोई सुराग नहीं मिला।

महापौर बोलीं-मां हूं तेरी

निर्मला पिनॉक व स्टेफनी कृपा गुरुवार को नगर निगम में महापौर प्रमिला पाण्डेय से मिलने पहुंचीं। इन्होंने शहर की पहली नागरिक से मदद मांगी कि वही कुछ करें और उनके पूर्वजों का पता लगाएं। दोनों ने अपनी जिंदगी के उस वृतांत को बताया जो अमेरिका में गुजरा था। सुनते-सुनते महापौर भी भावुक हो गईं। धीरे से अपने आंसुओं को पोछा और बोला-मां हूं मैं तेरी। असली न सही, मगर असली ही समझना। ये कानपुर तुम्हारा है। जब जी चाहे इस मां के पास चली आना। मेरे पास रुकना। कहीं और जाने की जरूरत नहीं है। अमेरिका जाना तो दोनों दामादों से गर्व से कहना है-कानपुर में उनकी सुपर मॉम मिल गई है जो मेयर है। यह सुनते ही निर्मला और कृपा की आंखों में आंसू आ गए। दोनों ने महापौर की कुर्सी के नीचे बैठकर फोटो करानी चाही तो महापौर ने झट दोनों को गोद में भर लिया। गले लगाते हुए बोलीं-यूं ही मुस्कुराती रहना। कानपुर की बेटियां कभी नहीं घबरातीं। तुम दोनों के असली मां-बाप को तलाश करने की कोशिश करूंगी मगर यह समझना कि कानपुर में तुम्हारी मां जैसी ही मां रहती है।

रबैका व स्टेफनी साथ-साथ, ये महज इत्तेफाक

रबैका व स्टीफन दोनों साथ-साथ ही अपने-अपने मां-बाप की तलाश कर रही हैं, यह भी एक इत्तेफाक है। दोनों बताती हैं कि वर्ष 1975 में यहां वे चैरिटी ऑफ मिशनरीज के अनाथालय में रहा करती थीं। हालांकि तब उनकी उम्र क्या थी इसकी जानकारी उन्हें नहीं है। बचपन में ही उन्हें चैरिटी ऑफ मिशनरीज की दिल्ली स्थित मुख्य शाखा में ले जाया गया था जहां दो अमेरिकन परिवारों ने उन दोनों को अलग-अलग गोद ले लिया था। तब से दोनों अमेरिका में हैं। अब दोनों की शादी हो चुकी है। स्टेफनी की शादी अमेरिका के साउथ कैरोलिना में हुई है जहां वह एनजीओ भी चला रही हैं। वहीं रबैका की शादी वाशिंगटन में हुई है जहां वह गृहिणी हैं। 2009 में स्टेफनी यहां मां-बाप की तलाश में आ चुकी हैं मगर रबैका पहली बार आई हैं। दोनों के पास बचपन के बस पासपोर्ट फोटो हैं जो दिल्ली में गोद लेने के दौरान लिए गए थे। अब न तो दिल्ली वालों को पता कि कानपुर में ये किसकी संतान हैं और न ही यहां मिशन ऑफ चैरिटी को ही। पुराने रिकॉर्ड गायब हो चुके हैं। इसी के साथ गायब हो गया है स्टेफनी और निर्मला का अतीत भी। अगर आपको कोई जानकारी हो तो इनकी मदद जरूर करें

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